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ॐ
गणेशाय सरस्वत्यै दुर्गया विष्णवे नमः ।
बहुभ्यो विघ्नविघ्नेभ्यो नमामि बहुविघ्नवान्॥
1.1 | 1.2 | 1.3 | 1.4 |
2.1 | 2.2 | 2.3 | 2.4 |
3.1 | 3.2 | 3.3 | 3.4 |
4.1 | 4.2 | 4.3 | 4.4 |
5.1 | 5.2 | 5.3 | 5.4 |
6.1 | 6.2 | 6.3 | 6.4 |
7.1 | 7.2 | 7.3 | 7.4 |
8.1 | 8.2 | 8.3 | 8.4 |
पाणिनीयस्य किं मूर्ख पाठनेनाङ्ग्लॱभाषया ।
गर्दभस्य हि वक्त्राय मधु क्षेप्तुं न युज्यते ॥
न गर्दभो यो न वेत्ति यो ऽविवित्सुः स गर्दभः ।
बोधनाय विवित्सूनां यां गृह्णन्ति तया वद ॥
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